झारखंड में हाइड्रोकार्बन उत्पादन की नई संभावनाएँ

कार्बनिक अवशेषों और भू-रासायनिक विश्लेषण के आधार पर हाइड्रोकार्बन की संभावनाएँ

Shale gas production site in Southern Karanpura coalfield
Image by axi-schnaxi from Pixabay

 झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित दक्षिण कर्णपुरा कोलफील्ड के पूर्वी क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन उत्पादन की महत्वपूर्ण संभावनाएँ सामने आई हैं। भू-रासायनिक आकलन और सूक्ष्म पैलिनोमॉर्फ जैसे कार्बनिक अवशेषों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि इस क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन उत्पादन की अत्यधिक संभावना है। इस खोज के अनुसार, पूर्वी सिरका कोयला क्षेत्र में उत्तर के गिद्दी क्षेत्र की तुलना में हाइड्रोकार्बन उत्पादन की उच्च क्षमता मौजूद है।

कोयला ब्लॉकों और ऊर्जा क्षमता का विश्लेषण

दक्षिण कर्णपुरा कोलफील्ड में 28 प्रमुख कोयला ब्लॉक हैं, जिनमें उपयोग योग्य कोयले के पर्याप्त भंडार मौजूद हैं। ऊर्जा की बढ़ती मांग और हाइड्रोकार्बन अन्वेषण में रुचि के कारण, यहां कोल बेड मीथेन और शेल गैस जैसे अपरंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस संभावित हरित ऊर्जा के लिए अनुकूल वातावरण की आवश्यकता है, जो देश की ऊर्जा रणनीति को मजबूत कर सकता है।

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दक्षिण कर्णपुरा बेसिन का भूवैज्ञानिक मानचित्र जिसमें अध्ययन किए गए जीवाश्म इलाका दिख रहा है

 

अनुसंधान विधि: कार्बनिक अवशेष और भू-रासायनिक विश्लेषण

इस क्षेत्र की ऊर्जा क्षमता का आकलन करने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने व्यापक पैमाने पर अनुसंधान किया है। इस अध्ययन में पराग, बीजाणुओं और अन्य सूक्ष्म अवशेषों के साथ-साथ रॉक-इवल पायरोलिसिस नामक प्रयोगशाला प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया। इसके तहत सिरका और गिद्दी-सी क्षेत्र के नमूनों का विश्लेषण कर उनकी हाइड्रोकार्बन क्षमता का आकलन किया गया।

संग्रह और विश्लेषण के प्रमुख मापदंड

सिरका और गिद्दी क्षेत्रों के ताजे नमूनों का विश्लेषण पैलिनोफेसीज, मुक्त हाइड्रोकार्बन (S1), भारी हाइड्रोकार्बन (S2), पायरोलाइज़ेबल कार्बन (PC) और अवशिष्ट हाइड्रोकार्बन (RC) जैसे मापदंडों के आधार पर किया गया। पर्मियन (बराकर) निक्षेपों से संबंधित इन नमूनों ने संकेत दिया कि दक्षिण कर्णपुरा कोलफील्ड के पूर्वी हिस्से में हाइड्रोकार्बन संसाधनों की प्रबल क्षमता मौजूद है।

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सिरका और गिड्डी सी क्षेत्र में विभिन्न पैलिनोफेसिस घटकों के वितरण को दर्शाने वाला टर्नरी प्लॉट

 

भविष्य के अन्वेषण प्रयास और ऊर्जा सुरक्षा में योगदान

इस अध्ययन का प्रकाशन जर्नल ऑफ एशियन अर्थ साइंसेज-एक्स में किया गया है, जो ऊर्जा क्षेत्र में अन्वेषण की दिशा में एक मील का पत्थर है। यह शोध आगे के आर्थिक अन्वेषण और ऊर्जा संसाधन विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। हालांकि, आर्थिक अन्वेषण की पुष्टि के लिए और अधिक विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है।

इस प्रकार, झारखंड के दक्षिण कर्णपुरा क्षेत्र में शेल गैस और हाइड्रोकार्बन उत्पादन के संकेत मिले हैं, जो देश की ऊर्जा जरूरतों और हरित ऊर्जा में स्वावलंबन की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।

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दक्षिण कर्णपुरा कोलफील्ड के स्रोत चट्टान में आनुवंशिक क्षमता को दर्शाता एक द्विचर ग्राफ।

 

क्या है शेल गैस

शेल गैस एक प्रकार की प्राकृतिक गैस है, जो शेल चट्टानों के बीच छोटे-छोटे गैप्स में फंसी होती है। इसमें मुख्य रूप से मेथेन गैस होती है, लेकिन इसे निकालना परंपरागत प्राकृतिक गैस से कठिन होता है क्योंकि यह गहरी और ठोस चट्टानों में फंसी होती है। शेल गैस को निकालने के लिए हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग (फ्रैकिंग) और हॉरिजॉन्टल ड्रिलिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

भारत में शेल गैस का उत्पादन अभी सीमित है। भारत में कुछ क्षेत्रों में शेल गैस के संभावित भंडार मौजूद हैं, जैसे:

  1. गोंडवाना बेसिन - मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में
  2. कावेरी बेसिन - तमिलनाडु में
  3. कृष्णा-गोदावरी बेसिन - आंध्र प्रदेश क्षेत्र में
  4. रान ऑफ कच्छ बेसिन - गुजरात में

हालांकि, भारत में अभी तक बड़े पैमाने पर शेल गैस उत्पादन नहीं हुआ है। भारत सरकार और तेल कंपनियाँ शेल गैस उत्पादन की संभावनाओं का अध्ययन कर रही हैं और नए भंडार खोजने के प्रयास में हैं। शेल गैस का उत्पादन बढ़ाने के लिए तकनीकी और पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान भी जरूरी है।

स्रोत-https://doi.org/10.1016/j.jaesx.2024.100181

पीआइबी

 

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